उत्तर प्रदेश चुनाव के पहले दौर के लिए अब एक महीनेभर से भी कम वक्त बचा है। लेकिन बीएसपी सुप्रीमो मायावती दो-तीन प्रेस कांफ्रेंस को छोड़कर मैदान में नजर नहीं आ रहीं हैं। उन्होंने जन्मदिन के मौके पर चुनाव मैदान में उतरने की तमाम अटकलों पर भी विराम लगा दिया है। मायावती की अंतिम रैली बीते 9 अक्तूबर को कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस पर उनके स्मारक स्थल पर हुई थी। तबसे तीन महीने से ज्यादा वक्त गुजर गए लेकिन बीएसपी के कार्यकर्ताओं को अपनी नेता के साक्षात दर्शन नहीं हुए हैं। जबकि चुनाव रैलियों पर रोक के पहले से ही प्रदेश में सत्ताधारी दल बीजेपी और दूसरी विपक्षी पार्टियां लावलश्कर के साथ चुनाव मैदान में कूद पड़ीं थीं।
मायावती ने पंजाब समेत दूसरे चुनावी प्रदेशों में राजनीतिक सहयोगी चुन लिए हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। उन्हें भरोसा है कि बीएसपी के कार्यकर्ता और समर्थक मान्यवर कांशीराम के सपने को पूरा करने के लिए इसबार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएंगे। वहीं दूसरी तरफ बीजेपी, सपा, आरएलडी और कांग्रेस में होड़ सी मची है। कोई आ रहा है, कोई जा रहा है। मायावती ये तमाशा बड़ी खामोशी से देख रहीं हैं। ऐसे में सवाल ये है कि उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर मायावती की रणनीति क्या है?
इस रणनीति को समझने के लिए हमें मान्यवर कांशीराम के लोकसभा में दिए भाषणों को याद करना होगा। बीएसपी के संस्थापक कांशीराम ने पार्टी की कमान मायावती को जीतेजी सौंप दी थी। तब उन्होंने कहा था, ‘मुझे भी एक दिन जाना है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का काम पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहना चाहिए।’ देश में लोकतंत्र को लेकर लोकसभा में दिए एक वक्तव्य में उन्होंने कहा था कि, ‘मैं समझता हूं इस देश में कोई लोकतंत्र नहीं है। एक खेल चल रहा है देश में। जिसमें अमीरों के नोटों से गरीबों के वोटों के साथ खिलवाड़ हो रहा है।’ बाबा साहेब अंबेडकर को याद करते हुआ कहा था, ‘अमीरों के पैसे से चुनाव लड़ा जाएगा, तो फिर इस देश में अमीरों की ही बात चलेगी, पैसे वाले लोगों की ही बात चलेगी। जो हम देख रहे हैं।’
मान्यवर कांशीराम ने बहुत पहले ही लोकतंत्र में मनी, माफिया और मीडिया के रोल और उनके अनैतिक गठबंधन को भांप लिया था। लोकसभा में इसका उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा था, ‘हम दुनियावालों को बताते हैं कि हम लोकतंत्र हैं, लेकिन सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के बिना लोकतंत्र कामयाब नहीं हुआ है और आनेवाले समय में भी कामयाब नहीं होगा।’ एकबार महाराष्ट्र के दलितों को संदेश देते हुए उन्होंने कहा था कि, ‘दलितों को गैर-दलित के दलित प्रेम से सावधान रहना चाहिए।’
कांशीराम का मानना था कि जीवन अंतर्विरोधों से भरा है और हमने अबतक लोकतंत्र में ‘वन मैन, वन वोट’ तो हासिल कर लिया है लेकिन ‘वन मैन, वन वैल्यू’ हासिल करने से कोसों दूर हैं। दलितों को सामाजिक और आर्थिक जीवन में आज भी ये हासिल नहीं है। ये काम दलित प्रेमियों से होने वाला नहीं है।’ समय समय पर अलग-अलग दलों से राजनीतिक साझेदारी या गठबंधन को लेकर वो कहते थे, ‘शोषित समाज को जहां फायदा दिखाई देगा, हम उसे लेने की कोशिश करेंगे। हम किसी के सामने हाथ फैलाने नहीं जाते, बल्कि लोग हमसे अपने फायदे के लिए हाथ मिलाने आते हैं।’
तो क्या इस चुनाव में मायावती की चुप्पी के पीछे मान्यवर कांशीराम की यही सीख और संदेश है? चुनाव-दर-चुनाव कमजोर प्रदर्शन के बाद वो सही समय का इंतजार कर रहीं हैं? तभी चुनाव मैदान से मायावती की दूरी को लेकर जब अमित शाह ने तो तंज कसा तो उन्होंने इसका पूरजोर विरोध नहीं किया। अमित शाह ने तो उनपर व्यक्तिगत टिप्पणी करते हुए यहां तक कह दिया, ‘बहनजी की तो अभी ठंड ही नहीं उड़ी है। ये भयभीत हैं। बहनजी चुनाव आ गया है, थोड़ा बाहर निकलिए। बाद में ये मत कहना कि मैंने प्रचार नहीं किया था।’
हालांकि मायावती ने अमित शाह को इशारों में जवाब जरूर दिया। मायावती ने कहा, ‘चुनाव से पहले जितनी भी जनसभाएं बीजेपी ने की हैं, वो सिर्फ और सिर्फ जनता के पैसे और सरकारी कर्मचारियों के भीड़ के बलबूते की है। सत्ता के लोगों को इतनी ठंड में भी जो गर्मी चढ़ी है वो गरीबों के पैसे की गर्मी है। सरकारी खजाने की गर्मी है। बीएसपी गरीबों की पार्टी है, किसी धन्नासेठ और पूंजीपतियों की नहीं। और कम संसाधनों वाली बीएसपी किसी का नकल नहीं करना चाहती।’
मायावती जानती हैं कि चुनाव से पहले किसी से हाथ मिलाने से कोई फायदा नहीं होने जा रहा है। वो मान्यवर कांशीराम की तरह अब इंतजार के मूड में हैं। उन्हें पता है कि अगर वो अपने दलित वोट को जोड़कर रख पाती हैं तो त्रिशंकु विधानसभा की सूरत में एकबार फिर उनकी लॉटरी लग सकती है।
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