कहते हैं जो सवाई माधोपुर की सीट जो जीतता है, राजस्थान में सरकार उसी पार्टी की बनती है। ये परंपरा दशकों से चली आ रही है। लेकिन इसबार बीजेपी की वरिष्ठ नेता आशा मीणा की बगावत पार्टी के गले की हड्डी बन गया है। उनके बगावती सुर के चलते सवाई माधोपुर की अहम सीट बीजेपी के हाथ से फिसलती सी नजर आ रही है। तो क्या राजस्थान में परंपराओं को तोड़ते हुए गहलोत सरकार की वापसी हो रही है?

सवाई माधोपुर को राजा हठी हम्मीर की धरती कहा जाता है जो 12 वीं सदी में पैदा हुए थे। राजा हम्मीर देव रणथंभौर के चौहान वंश के सबसे शक्तिशाली और महत्वपूर्ण शासक थे। वो जो ठान लेते थे उस पर फिर से विचार नहीं करते थे। और लगता है बीजेपी प्रदेश कार्यसमिति की सदस्य आशा मीणा के शरीर में हठी हम्मीर की आत्मा प्रवेश कर गई है। उन्होंने ताल ठोंकते हुए बीजेपी के अधिकृत प्रत्याशी डॉ. किरोड़ीलाल मीणा के नाम की घोषणा के बावजूद निर्दलीय चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है और बीजेपी के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
चुनाव लड़ने को लेकर आशा मीणा की गंभीरता को इससे समझा जा सकता है कि उन्होंने 26 अक्तूबर को अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ त्रिनेत्र गणेशजी के दर्शन कर अपनी दावेदारी पेश कर दी है। उन्होंने रणथंभौर में साफ कहा, “मैं सवाई माधोपुर की बेटी हूं, बहू हूं, सवाई माधोपुर के लोग मेरा परिवार हैं। मैं बीते एक दशक से यहां बीजेपी को मजबूत बनाने के लिए काम कर रही हूं। मगर बीजेपी आलाकमान ने एक ऐसे शख्स को टिकट दे दिया है जिसने जन भावनाओं के साथ कुठाराघात किया है।“

उन्होंने सवाई माधोपुर में विधिवत अपने चुनाव कार्यालय का उद्घाटन करते हुए आलाकमान को दो टूक शब्दों में संदेश दे दिया है कि पार्टी अपने फैसले पर पुनर्विचार करे और सवाई माधोपुर से डॉ. किरोड़ीलाल मीणा का जगह उन्हें मैदान में उतारे। उधर बीजेपी के राजस्थान के प्रभारी अरुण सिंह ने साफ किया है कि किसी भी प्रत्याशी के टिकट में कोई बदलाव नहीं होगा। क्योंकि टिकट वितरण का काम केंद्रीय चुनाव समिति की देखरेख में संपन्न हुआ है। जबकि कांग्रेस ने वर्तमान विधायक दानिश अबरार को ही फिर से चुनाव मैदान में उतारा है।
सवाई माधोपुर जिले में 4 विधानसभा क्षेत्र हैं। सवाई माधोपुर, गंगापुर सिटी, बामनवास और खंडार। बामनवास अनुसूचित जनजाति और खंडार अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व है। इस बार चुनावों में यहां ERCP का मुद्दा प्रमुख रूप से हावी रहने की उम्मीद है। सवाई माधोपुर जिला रोजगार, शहरी विकास, पेयजल की समस्या और बढ़ते अपराध जैसी समस्याओं से भी जूझ रहा है। अवैध बजरी खनन यहां के लिए नासूर बन चुका है। सवाई माधोपुर जिले में ना तो कोई बड़ी इंडस्ट्री है और ना ही शिक्षा का कोई बड़ा केंद्र। ऐसे में चुनाव को लेकर लोगों में खासी दिलचस्पी दिखाई दे रही है।
ऐसी धारणा है कि सवाई माधोपुर का विधायक अगला चुनाव नहीं जीत पाता। वोटर यहां से हरबार अपना नया विधायक चुनकर विधानसभा में भेजते हैं। अब तक 7 बार कांग्रेस, 3 बार भाजपा और 4 बार निर्दलीय जीते हैं। 2008 में यहां से कांग्रेस के अलाउद्दीन आजाद ने जीत दर्ज की थी। 2013 में बीजेपी से महिला प्रत्याशी राजकुमारी दीया कुमारी ने जीत दर्ज की और 2018 में कांग्रेस के दानिश अबरार ने जीत दर्ज की। तो क्या बीजेपी में बगावत को देखते हुए ये परंपरा टूटने जा रही है। और इसके बड़े संदेश और संकेत क्या नजर रहे हैं?

सवाई माधोपुर सीट पर जाति सबसे बड़ा फैक्टर है। यहां मीणा, मुस्लिम, वैश्य और गुर्जर मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। इनके अलावा एससी, ब्राह्मण, बनिया, माली और राजपूत समाज भी यहां राजनीति में दखल रखते हैं। मुस्लिम आबादी करीब 12 फीसदी है। कांग्रेस को बीचे चुनाव में इस जिले की 4 सीटों में से सवाई माधोपुर, बामनवसा (ST) और खंडार (SC) में बड़ी जीत हासिल हुई थी। जबकि गंगापुर सिटी सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी के खाते में गई थी।
अब डॉ. किरोड़ीलाल मीणा के खिलाफ आशा मीणा के मैदान में उतरने से यहां मुकाबला बेहद दिलचस्प और रोचक हो गया है और पूरे प्रदेश की निगाहें इस सीट पर जा टिकी हैं। वैसे बीजेपी उम्मीदवार डॉ. किरोड़ीलाल मीणा 5 बार विधायक और 3 बार सांसद रह चुके है। डॉक्टर साहब फिलहाल राज्यसभा सांसद हैं। वो सवाईमाधोपुर से 3 बार चुनाव लड़े हैं जिनमें वो 2 बार चुनाव हार गए। 2003 में पहली बार जीतने पर उन्हें खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री का पद सौंपा गया था।
सवाई माधोपुर सीट पर मुस्लिम वोटर्स खासी तादाद में हैं, जो कांग्रेस के वोटर माने जाते हैं। बावजूद इसके कांग्रेस के विधायक दानिश अबरार को एंटी इनकंबेंसी का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि यहां के वोटर ये भी मानते हैं कि उन्होंने कई क्षेत्रों में अच्छा काम किया है। गहलोत सरकार की सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं का लाभ भी यहां के लोगों को मिला है। वाबवूद इसके परंपराओं को देखते हुए यहां कांग्रेस को जीत के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ सकती है।
डॉ. किरोड़ीलाल मीणा की बात करें तो उन्होंने बंद पड़ी सवाई माधोपुर में सीमेंट फैक्ट्री के लिए बड़ा आंदोलन किया है और वो इस मुद्दे को हर मंच पर जोर-शोर से उठाते रहे हैं। जनता ने उन्हें कई बार संसद और विधानसभा भी भेजा है। मगर आशा मीणा की बगावत को देखते हुए उनके जीत के रास्ते में कांटे ही कांटे नजर आ रहे हैं। सवाई माधोपुर मिठाई और दूध उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। गंगापुर शहर “खीरमोहन” और खंडार “बर्फी” के लिए प्रसिद्ध है। मगर ये खीरमोहन और बर्फी इस बार बीजेपी और डॉ. किरोड़ी लाल मीणा के लिए मुश्किल ही नजर आ रही है।
(रिसर्च इनपुट रिज़वान रहमान)