दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी की शर्मनाक हार की बहुत सारी व्याख्याएं हो रही हैं। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या केजरीवाल को इस हार की आशंका नहीं थी? दरअसल दिल्ली में आम आदमी पार्टी की हार की स्क्रिप्ट तो लोकसभा चुनाव के नतीजों ने ही लिख दी थी। कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के बाद भी दिल्ली में प्रचंड बहुमत वाली सरकार सात सीटों में से एक सीट भी नहीं जीत पाई। वो भी तब जब केजरीवाल को चुनाव प्रचार के लिए जमानत मिली थी। और तो और केजरीवाल ने लोगों के बीच जाकर कहा था कि अगर आप हमें वोट देकर जिताओगे तो हमें जेल नहीं जाना पड़ेगा। लेकिन दिल्ली की जनता ने तब उन्हें फिर से जेल जाने का ही फैसला सुनाया। दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे तभी स्पष्ट हो गए थे।
केजरीवाल राजनीति के चतुर खिलाड़ी है। इसमें दो राय नहीं है। पहले उन्होंने जेल से ही सरकार चलाने का रायता फैलाया। लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नकेल टाइट कर दी तो उनके सामने जेल से बाहर आने के बाद इस्तीफा देने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं रह गया था। केजरीवाल ने पहले बीजेपी पर उन्हें तंग करने, झूठे केस में फंसाने जैसी बहानेबाजी कर जनता को भरमाने की पुरजोर कोशिश की। लेकिन वो समझ गए कि एक बोतल पर एक बोतल ही नहीं, दो दो बोतल तक फ्री शराब अपनी आंखों से देखने वाली दिल्ली की जनता को उनकी बातों पर यकीन नहीं कर रही है। लिहाजा उनका इमोशनल कार्ड पूरी तरह फेल साबित हो रहा था।
केजरीवाल के सामने बड़ा सवाल ये था कि मुख्यमंत्री किसे बनाया जाए? केजरीवाल ने पहले अपनी पत्नी सुनीता केजरीवाल पर दांव खेलने की कोशिश की। उन्हें आगे भी किया। लेकिन परिवारवाद के आरोप लगने के डर से उन्होंने अपने कदम वापिस खींच लिए। फिर आतिशी को कमान ये सोचकर सौंपी गई कि वो कभी बगावत के बारे में सोच भी नहीं सकती हैं। आतिशी ने भी खुद को खड़ाऊ मुख्यमंत्री साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनकी स्वामीभक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने सीएम की कुर्सी पर बैठने तक से गुरेज किया।
इस बीच बीजेपी ने शीशमहल का मुद्दा भी सार्वजनिक कर दिया। जिसने केजरीवाल की एक आम आदमी और ईमानदार आदमी की छवि को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। केजरीवाल को पता था कि उनकी सरकार ने दिल्लीवालों के लिए कुछ मुफ्त सुविधाएं देने के अलावा कोई ठोस काम नहीं किया है। उनके पास एक आधुनिक दिल्ली को लेकर कोई रोडमैप नहीं है। उन्हें लगा कि हर महीने हजार दो हजार की सुविधाओं के लोभ में लोग उन्हें वोट देते रहेंगे। लेकिन जैसे जैसे चुनाव कि दिन नजदीक आते गए लोगों ने उनके कार्यकर्ताओं के सामने समस्याओं के अंबार परोस दिए। पीने के पानी, टूटी सड़कें, यमुना की सफाई, सीवर लाइन और कचरे के पहाड़ जैसे बुनियादी मुद्दे सामने आ गए। केजरीवाल इनके सामने स्कूल ठीक कर दिया, अस्पताल ठीक कर दिया जैसी बातें करते रहे, जो बीते 5 सालों में अपना आकर्षण खो चुके थे। लिहाजा उन्होंने विक्टिम कार्ड खेलने के साथ ही गांधीवादी तरीका अपनाने की भी कोशिश की।
केजरीवाल ने कई इंटरव्यू में कहा कि वो लोगों को पानी पहुंचाने, सड़क बनाने, यमुना को साफ करने जैसे कई वादों को पूरा करने में नाकाम रहे हैं। ये स्वीकारोक्ति अनायास नहीं थी। उन्हें पता था कि वो चुनाव हारने जा रहे हैं। क्योंकि सिर्फ फ्री बिजली-पानी और मोहल्ला क्लिनिक के सहारे वो चुनाव नहीं जीत सकते हैं। क्योंकि उनकी इन सुविधाओं को दिल्ली के मध्यवर्ग को कोई फायदा नहीं मिलता है। बीजेपी ने भी इन मुद्दों को मकर उठाया। रही सही कसर कांग्रेस ने चुनाव के आखिरी समय में जोर लगाकर पूरी कर दी।
अपनी हार को भांपते हुए ही केजरीवाल ने दिल्ली की महिलाओं को 2100 रुपए महीने का नया वादा कर डाला। जबकि वो लोकसभा चुनाव से पहले दिल्ली की महिलाओं को 1000 रुपए देने का वादा पूरा नहीं कर पाए। केजरीवालयहीं नहीं रुके। उन्होंने ऑटो वाले, छात्रों, धोबी, सोसाइटियों के आरडब्ल्यूए के लिए नए-नए वादे कर उन्हें फिर से भरमाने की कोशिश की। लेकिन दिल्ली की जनता ने रोजगार और एक बेहतर जीवन की आस में केजरीवाल को अपनी नजरों से उतार दिया। वो तो भला हो दिल्ली के मुसलमानों और दलितों का, जिन्होंने एक बार फिर से केजरीवाल को वोट दे दिया। जिनकी बदौलत आम आदमी पार्टी 22 सीट जीतने में कामयाब रही। वर्ना इस बार केजरीवाल को दो अंकों के आंकड़े तक पहुंचने में भी हांफना पड़ सकता था।