काशी शांत है। चुनाव प्रचार खत्म हो चुका है। प्रधानमंत्री शहर से जा चुके हैं। लोगों ने खासकर कारोबारियों और ऑटो चालकों ने राहत की सांस ली है। वाराणसी में राजनीतिक चहल-पहल तभी नजर आती है जब कोई राजनेता आता है। कारोबारी अपने काम में लगे नजर आते हैं। सबसे ज्यादा भीड़ दिनभर काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, गोदौलिया बाजार और लंका चौराहे पर नजर आती है। लोगों से राजनीति की बात करना आसान नहीं है। बनारसी बाबू साफ कुछ नहीं बोलते। वोट किसे डालेंगे जैसे सवालों पर वो आपके अस्सी कोस की परिक्रमा करा देंगे। आपको जो समझना हो समझ लीजिए।
अगर आप काशी नहीं गए तो आपको लगेगा कि काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनाने के चक्कर में सारी गलियां ध्वस्त कर दी गईं हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। अब भी सैकड़ों गलियां और बाजार मौजूद हैं जो कॉरिडोर के नक्शे में नहीं आए हैं। गंगा में डुबकी लगाने के बाद काशी विश्वनाथ मंदिर पहुंचने के रास्ते में हजारों देवताओं के छोटे-छोटे मंदिर हैं, लेकिन ज्यादातर लोग अब नए बने मुख्य द्वार से ही मंदिर तक पहुंचते नजर आते हैं। जिसे लेकर गलियों में मौजूद दुकानदारों में गुस्सा है। उनका कारोबार चौपट हो गया है।
काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के बहाने सिर्फ मंदिर का जीर्णोद्धार नहीं किया गया है। लेकिन यहां धर्म का कॉरपोरेटीकरण ही नजर आता है। मंदिर परिसर को किसी पांच सितारा होटलों की तरह तैयार किया जा रहा है। आलीशान दरवाजे और भक्तों के ठहरने के लिए सैकड़ों एयर कंडीशन कमरे। लोगों का कहना है कि दो-तीन पांच सितारा होटल भी बनेंगे। गलियों, मकानों और छोटे मंदिरों को तोड़कर निकाली गई जगह में बड़ी-बड़ी सौ से ज्यादा दुकानें निकाली गई हैं। जिनपर फिलहाल पुलिस का पहरा रहता है। तो क्या ये दुकानें उन लोगों के हिस्से में आएंगी, जिनके घर या मंदिर टूटे हैं? जवाब है नहीं।
चुनाव के बाद काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की इन दुकानों की नीलामी होगी। जाहिर है कि स्थानीय लोग इस नीलामी से वैसे ही बाहर हो जाएंगे। हालाांकि ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनने से खुश नजर आते हैं। वो इसे काशी का विकास मानते हैं। इन्हें मुआवजा भी अच्छा खासा मिला है। लेकिन जिनकी रोजी-रोटी चली गई और मुआवजा भी नहीं मिला, वो पानी पी-पी कर सरकार को कोसते हैं। उनके भीतर एक जलन की भावना भी नजर आती है। शायद इसलिए कि उनके खाते में मायूसी ही आई है।
गंगा आरती और नाव की सवारी यहां आने वाले भक्तों का खास शगल है। यहां छोटी-छोटी नावों से घाटों की सैर कराने वाले मल्लाह आशंकित हैं। वो कहते हैं, ’50-100 रुपए की सवारी की जगह क्रूज वाले एक यात्री से हजार रुपए तक वसूल रहे हैं। आने वाले दिनों में तो छोटे-छोटे क्रूज भी आने वाले हैं। अब हमारी रोजी-रोटी तो भोलेबाबा के भरोसे ही है।’ यानी वैभवशाली काशी और मंदिर की भव्यता के नाम पर सबकुछ छीनने की तैयारी चल रही है। गंगा आरती आज जहां होती है उसके अलावा भी गंगा में डुबकी लगाने के लिए काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के बन रहे नए मुख्य द्वार के पास एक और नई आरती की जगह बन सकती है। जिसे लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
काशी का पूरा चक्कर लगा आइए आपतो कोई पोस्टर बैनर या किसी पार्टी का झंडा नजर नहीं आता। हां, इक्का-दुक्का मोदीजी की सरकारी योजनाओं के होर्डिंग नजर आते हैं। लेकिन खास बात ये है कि उनसे ज्यादा तो कथित राष्ट्रीय चैनलों के एंकरों के बड़े-बड़े विज्ञापन वाले होर्डिंग्स नजर आते हैं। जो सिर्फ सरकार नहीं, भविष्य बनाने का नारा देते नजर आते हैं। इसका मतलब आप समझ सकते हैं।
यहां के पीलीकोठी, बेनियाबाग, मदनपुरा, रेवड़ी तालाब, बजरडीहा, शिवाला, गौरीगंज के इलाके में लोगों की खामोशी बता देती है कि अबकी चुनाव में क्या होने वाला है। हां, जो गरीब और मेहनकश लोग हैं वो साफ बोलते हैं। बिना किसी लाग लपेट के बोलते हैं। ‘महंगाई और बेरोजगारी बहुत बड़ा मुद्दा है। अबकी बार साइकिल को वोट देंगे।’ लोग ये भी कहते हैं कि बीएसपी को वोट देने का मतलब है बीजेपी को वोट देना।
कांग्रेस को वोट मिलेगा या नहीं? इस सवाल पर लोग दुविधा में नजर आते हैं। लेकिन प्रियंका गांधी की मेहनत रंग लाती नजर आ रही है, जिसका फायदा उन्हें 2024 के चुनाव में मिल सकता है। मोदीजी के रोड शो में भारी भीड़ को यहां के लोग ज्यादा अहमियत नहीं देते। उनका कहना है कि सबकी रैली और रोड शो में इतनी ही भीड़ आती है। गोदौलिया या बीएचयू चौराहे पर आप भी रोड शो कर लीजिए। आपको कैमरे में उतनी ही भीड़ नजर आएगी। दरअसल यहां हर वक्त दो-चार हजार लोग घूमते-टहलते रहते हैं। इससे वोट का अंदाजा लगाकर आप गलत साबित हो जाएंगे।