दिल्ली में आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की शर्मनाक हार के बाद ये कयास लगाए जा रहे हैं कि अब वो पंजाब की कमान संभाल सकते हैं। इसके लिए केजरीवाल ने पंजाब के सभी विधायकों और मंत्रियों को तलब किया है। खबर तो ये भी है कि केजरीवाल की इस कोशिश से भगवंत मान नाराज हैं और वो पार्टी में बड़ी तोड़ कर सकते हैं और आम आदमी पार्टी (पंजाब) का गठन कर सकते हैं। ये बैठक 11 फरवरी को दिल्ली में होनी है। हो सकता है इस फैसले पर आखिरी मुहर लगने में कुछ वक्त लग जाए। वैसे पंजाब की राजनीति के जानकारों का मानना है कि केजरीवाल को पंजाब का मुख्यमंत्री बनने में नाकों चने चबाने पड़ सकते हैं।
सवाल ये है कि केजरीवाल किस नैतिक बल से पंजाब के मुख्यमंत्री की कुर्सी हथियाना चाहते हैं। केजरीवाल एक तो शराब घोटाले में बुरी तरह फंसे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने उनके दफ्तर जाने, सरकारी फाइलों को देखने और कैबिनेट की बैठक बुलाने तक पर रोक लगा रखी है। वो फिलहाल जमानत पर बाहर है। दिल्ली विधानसभा के चुनावों में अभी-अभी हारे हैं। ये हार इतनी शर्मनाक है कि वो अपनी सीट तक नहीं बचा पाए हैं। फिर वो किस हैसियत से पंजाब की कुर्सी पर अपनी दावेदारी पेश करेंगे। फिर पंजाब के मौजूदा मुख्यमंत्री भगवंत मान को हटाने के लिए उनके पास कोई ठोस वजह होनी चाहिए। भगवंत मान शराब पीते हैं, सिर्फ इस वजह से तो उन्हें मुख्यमंत्री पद से नहीं हटाया जा सकता। और एक सवाल ये भी कि क्या पंजाब के लोग एक गैर पंजाबी को अपना मुख्यमंत्री कबूल करेंगे?
पुरानी कहावत है कि युद्ध में हारे योद्धा को बड़ा ओहदा नहीं दिया जाता है। अब केजरीवाल भले ही रिमोट से पंजाब की सरकार चला रहे हों, लेकिन सूबे की कमान अपने हाथ में लेना अलग बात होगी। अगर तकनीकी तौर पर देखे तो दिल्ली के मुख्यमंत्री की हैसियत पंजाब के मुख्यमंत्री के मुकाबले बहुत कमजोर है। दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश है। जिसके मुखिया मोटे तौर पर एलजी साहब हैं। दिल्ली के पास अपनी ना तो पुलिस है और ना ही जमीन। ऐसे में आंदोलन से निकले केजरीवाल के पास पंजाब जैसे बॉर्डर स्टेट की सुरक्षा व्यवस्था को संभालने का कोई अनुभव भी नहीं होगा। केजरीवाल को नहीं मालूम कि राज्य पुलिस के साथ सुरक्षा बलों का तारतम्य किस तरह का होना चाहिए। दिल्ली में तो हुए किसी अपराध का ठीकरा वो केंद्र सरकार के मत्थे मढ़कर निश्चिंत हो जाते थे।
पंजाब सरकार की वित्तीय स्थिति इस वक्त बेहद कमजोर है। उसपर 3.5 लाख करोड़ से ज्यादा का कर्ज है। उसे हर महीने और कर्ज लेने पड़ रहे हैं। पंजाब चुनावों से पहले जनता से किए वायदे भी सरकार पूरे नहीं कर पा रही है। उदाहरण के तौर पर पंजाब की हर महिला को 1000 रुपए महीना देने के वादे सरकार पूरा नहीं कर पाई है। ऊपर से पंजाब के हर विभाग में भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया है। इन सबके बावजूद विज्ञापनों पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। दिल्ली के चुनावों से पहले पंजाब सरकार के सरोगेट विज्ञापन की बाढ़ सी आ गई थी। हालांकि इसका कोई खास फायदा दिल्ली के चुनावों में हुआ हो, ऐसा नहीं लगता।
ऐसे में अगर केजरीवाल पंजाब के मुख्यमंत्री बन भी जाते हैं तो वो कौन सा तीर मार लेंगे। केजरीवाल की पूरी राजनीति मुफ्त की रेवड़ी और वोटरों के लालच के ईर्द-गिर्द ही घूमती है। दिल्ली में बीते 11 साल में केजरीवाल सरकार या उनके विधायकों ने वहीं काम किए हैं जिनमें रिश्वतखोरी की संभावना बनती हो। वर्ना आज दिल्ली के लोगों को साफ पानी मिल रहा होता। सड़कें तक ना टूटी ना होती। यमुना मैला ना होती। और तो और दिल्ली एक स्लम सिटी के तौर पर आगे बढ़ती हुई दिखाई ना देती। जहां कुछ बुनियादी सुविधाओं का फ्री मिलना और जिंदा रहना ही विकास मान लिया गया है।
और जो सबसे बड़ा सवाल है कि भगवंत मान को हटाकर जब केजरीवाल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेंगे तो पंजाब की जनता उनके बारे में क्या सोचेगी? क्या उनके मन में ये ख्याल नहीं आएगा कि दिल्ली की जंग का हारा एक सिपाही उनके माथे पर आकर बैठ गया है। ताकि वो उन सुख-सुविधाओं का लाभ उठा सके जिसे दिल्ली की जनता ने उनसे छीन लिया है। लिहाजा केजरीवाल के अंदर अगर थोड़ी भी नैतिकता बची हो तो उन्हें पंजाब का मुख्यमंत्री बनने का दुस्साहस नहीं करना चाहिए। वर्ना इसे उनकी एक और राजनीतिक बेशर्मी ही माना जाएगा।