ये लगातार तीसरा मौका है जब दिल्ली विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी का खाता नहीं खुला। यानी कांग्रेस ने शून्य पर आउट होने की हैट्रिक लगाई है। सवाल ये उठता है कि दिल्ली में 15 साल तक सत्ता संभालने वाली कांग्रेस शीला दीक्षित के बेहतरीन कामों के बावजूद दिल्ली के वोटरों का विश्ववास हासिल करने में नाकाम क्यों रही? कांग्रेस के सामने ये एक ऐसा यक्षप्रश्न है जिसका जवाब कांग्रेस को ढूंढना होगा। पार्टी को हर स्तर पर आत्मचिंतन करना होगा। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या कांग्रेस पार्टी दिल्ली विधानसभा का चुनाव जीतने के लिए लड़ रही थी या उसका लक्ष्य केवल केजरीवाल को हराकर हरियाणा, गोवा और गुजरात में पार्टी की हार का बदला लेना भर था?
चलिए थोड़ा पीछे लौटते हैं। साल 2015 में केजरीवाल ईमनादारी के रथ पर सवार थे और उन्होंने आरएसएस और बीजेपी की मदद से कांग्रेस का ऐसा सूपड़ा साफ किया कि कांग्रेस ने दिल्ली में फिर कभी जीत पाने का भरोसा और आत्मबल ही खो दिया। कांग्रेस का संगठन बिखर गया और उसके कार्यकर्ता और वोटर आम आदमी पार्टी के पाले में चले गए। कांग्रेस के कोर वोटर जो दलित और मुसलमान थे, उन्होंने केजरीवाल का दामन थाम लिय़ा। आम आदमी पार्टी की प्रचंड जीत के आगे दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता अचानक बौने नजर आने लगे। जिसका असर लोकसभा चुनाव के नतीजों में भी नजर आया।
अब बात 2025 के चुनाव की। इस चुनाव से पहले इंडिया गठबंधन बना और उन्होंने मोदीजी के अबकी बार 400 पार के सपनों को 2024 के लोकसभा चुनावों में चूर-चूर कर दिया। बीजेपी का मनोबल कमजोर पड़ गया और कांग्रेस में गजब का जोश और उत्साह नजर आने लगा था। नतीजा ये हुआ कि कांग्रेस के अंदर नेताओं की महत्वकांक्षाएं उबाल मारने लगीं। कांग्रेस अपने सहयोगियों को आंख दिखाने लगे। हरियाणा विधानसभा चुनाव में तो कांग्रेस कांग्रेस से ही लड़ती नजर आई। जीत मिलने से पहले ही कौन बनेगा मुख्यमंत्री की लड़ाई शुरू हो गई। आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन को लेकर कांग्रेस समय से कोई फैसला ले पाई। नतीजा कांग्रेस बीजेपी के मुकाबले आधे फीसदी वोट के अंतर से चुनाव हार गई। आम आदमी पार्टी कोई सीट नहीं जीत पाई मगर 1.79 फीसदी वोट लाकर कांग्रेस का खेल जरूर खराब कर दिया। हाथ में आई गेंद के फिसलने से कांग्रेस का मनोबल टूट गया।
महाराष्ट्र विधानसभा के चुनावों में भी कांग्रेस की राज्य ईकाई और केंद्रीय नेतृत्व के बीच सहयोगी दलों के साथ सीटों के बंटवारे को लेकर अंतिम समय तक रस्साकशी चलती रही। नतीजा वहां भी इंडिया गठबंधन हार गई। जबकि लोकसभा चुनावों के नतीजों को देखते हुए महाराष्ट्र में सरकार बनने की पूरी संभावना नजर आ रही थी। इन दोनों राज्यों में मुंह की खाने के बाद कांग्रेस जहां आहत थी वहीं उसके भीतर चुनाव लड़ने का हौसला नहीं बचा था। दिल्ली के चुनावों से पहले राहुल गांधी ने यहां पदयात्रा निकालने की घोषणा की थी। लेकिन बाद में वो पीछे हट गए और पदयात्रा का जिम्मा स्थानीय नेताओं ने निभाया। दिल्ली में डबल शून्य के बावजूद पार्टी के नेता आपस में खुलेआम लड़ते दिखाई दिए। कांग्रेस अगर कोई चेहरा सामने रखकर लड़ती को एंटी इंकम्बेंसी का फायदा उसे मिल सकता था।
दिल्ली विधानसभा चुनावों में कांग्रेस कोई नैरेटिव भी सेट नहीं कर पाई। कांग्रेस के नेता सार्वजनिक तौर पर ये कहने से बचते दिखाई दिए कि वो सरकार बनाने जा रहे हैं। और अगर वो बढ़-चढ़कर सरकार बनाने की दावेदारी पेश करते तो शायद कांग्रेस को आज ये दिन नहीं देखने पड़ते। उन्हें इस बात से संतोष नहीं करना पड़ता कि उन्होंने 14 सीटों पर आम आदमी पार्टी को हराकर हरियाणा का बदला ले लिया है। जबकि 2020 के चुनावों में महज 8 सीट हासिल करने वाली बीजेपी ने दिल्ली के लोगों को ये भरोसा दिलाया कि वो सरकार बनाने जा रहे हैं। जिस सत्ता विरोधी भावना का फायदा कांग्रेस को उठाना चाहिए था, उसका फायदा बीजेपी ने उठाया। कांग्रेस चुनाव के अंत अंत तक ये सोच ही नहीं पाई कि दिल्ली में केजरीवाल को हराया भी जा सकता है। इसकी तस्दीक राहुल गांधी की कई रैलियों के आखिरी समय में रद्द होने और कांग्रेस के प्रचार अभियान के बहुत देर से शुरू होने से भी लगाया जा सकता है।
