
– अखिलेश सुमन
मोहन यादव को मध्य प्रदेश का मुख्य मंत्री बनाकर बीजेपी ने 2024 के लिए यादवों का वोट सुरक्षित कर लिया है। इसका असर मध्य प्रदेश के अलावा बिहार और उत्तर प्रदेश के यादव मतदाताओं पर भी पड़ेगा। मध्य प्रदेश में यादवों की संख्या 12 से 14 प्रतिशत है। इस कदम से बीजेपी की कोशिश कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के जातीय जनगणना को निष्प्रभावी करने की है।
बीजेपी ने हालांकि एक बार पहले भी मध्य प्रदेश में यादव एमएलए बाबूलाल गौड़ को मुख्य मंत्री बनाया था। मध्य प्रदेश में यादवों की छवि वो नहीं है जो लालू यादव के समय बिहार में या मुलायम सिंह यादव के समय उत्तर प्रदेश में थी। बीजेपी के इस कदम से बीजेपी के समर्थकों में भी एक संदेश जाएगा कि वो उच्च जाति आधारित पार्टी नहीं है।
मोहन यादव इसके पहले शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री थे। कांग्रेस ने भी यादव मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरुण यादव को आगे किया था और उन्हें विधान सभा चुनाव में बुंदेलखंड की कमान भी सौंपी थी।
मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ राजस्थान विधान सभा चुनाव जीत जाने के बाद भी बीजेपी को इस बात का अंदेशा था कि आम चुनाव के समय भी यही स्थिति रहेगी या नहीं। इसीलिए मोहन यादव के भाग्य का पिटारा खुल गया। अब इंडिया गठबंधन के लिए यह कहना मुश्किल होगा कि वो बीजेपी पिछड़ों का ख्याल नहीं रखती।

छतीसगढ़ में आदिवासी, मध्य प्रदेश में पिछड़ा तो राजस्थान में संभव है कि बीजेपी किसी दलित को मुख्य मंत्री बना दे। इससे वो हिन्दी इलाके में मलिकार्जुन खड़गे का प्रभाव काम करने की कोशिश कर सकती है।
बीजेपी द्वारा इन तीन राज्यों में मुख्य मंत्रियों की घोषणा ने इंडिया गठबंधन के सामने नई चुनौती पैदा की है। क्या वो जातीय आधार पर 2024 का चुनाव लड़ेंगे या किसी और मुद्दे की तलाश करेंगे। यह यहां सवाल है। साथ ही बीजेपी के लिए चुनौती यह होगी कि सामान्य जाति के लोगों को कैसे समझाया जाए। क्या सामान्य जाति के लोगों को यह महसूस नहीं होगा कि बीजेपी भी पिछड़ावाद के रास्ते पर चल पड़ी है?
यह एक यक्ष प्रश्न है लेकिन अगड़ी जाति का रुझान इसपर भी तय होगा कि नए बने मुख्यमंत्री कैसा प्रदर्शन करते हैं, सभी जातियों को समान दृष्टि से देखते हैं या जातिवाद में वैसे ही संलग्न हो जाते हैं जैसा लालू यादव या मुलायम सिंह यादव के समय बिहार और यूपी में हुआ था।