– संजय कुमार
वरिष्ठ पत्रकार कमाल ख़ान नहीं रहे। हार्ट अटैक से आज सुबह उनका निधन हो गया। इस खबर पर पहले तो यकीन ही नहीं हुआ। ऐसा लगा मानो किसी ने शरारत करते हुए ये झूठी खबर उड़ा दी होगी। कल रात ही उन्हें एनडीटीवी पर एक शो में देखा गया था। उन्होंने महिला वोटरों के विमर्श पर बड़ी खूबसूरती से अपनी तकरीर रखी थी। मगर अफसोस! सच को देर तक झुठलाया नहीं जा सकता। सवाल ये है कि अचानक ऐसा क्या हुआ कि कमाल साहब ने दुनिया को अलविदा कह दिया? उनके दिलो दिमाग में आखिर क्या चल रहा था, कि अचानक इतनी तेज दिल का दौरा पड़ा।
दरअसल, कमाल ख़ान ने गोदी मीडिया के दौर में भी लोकतंत्र, संविधान और धर्मनिरपेक्षता का दामन नहीं छोड़ा। आज किसी मुसलमान का किसी न्यूज चैनल के न्यूज रूम में 8 घंटे बिताना कितना मुश्किल काम है, ये मुसलमान हुए बिना आप नहीं समझ सकते। दरअसल, हर क्षण घृणित, सांप्रदायिक और फासीवादी सोच के माहौल में रहना बहुत मुश्किल होता है। एनडीटीवी के लिए लखनऊ से रिपोर्टिंग करते हुए कमाल साहब को रोजमर्रा के कामकाज में तो ये सब नहीं झेलना पड़ा होगा। लेकिन खाने-खाने में बंटी पतनशील पत्रकारिता के विद्रूप रूप को उन्होंने बहुत करीब से जरूर देखा और महसूस किया होगा। एक कौम के साथ रोज-रोज होने वाली ज़लालत की रिपोर्टिंग करना आसान नहीं होता। वो भी तब, अगर आप भी उसी समाज, कौम का हिस्सा हों।
कमाल ख़ान साहब ने मुसलमान होने के बावजूद बाबरी मस्जिद को गिराने जाने से लेकर हाल के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशों, बदतमीजियों की बेहतरीन रिपोर्टिंग की। खूबसूरत डॉक्यूमेंट्री बनाई। जिसकी मिसाल लंबे समय तक दी जाएगी। उन्हें हिंदुस्तान के ताने-बाने की बेहतरीन समझ थी। मोदी-योगी राज में सांप्रदायिक तत्वों की गुंडागर्दी से वो डरते नहीं थे। वो अपनी फिल्ड रिपोर्टिंग में हमेशा निडर रहे। अपनी बात बेलाग तरीके से कही। एक-एक पीटीसी पर वो कितनी मेहनत करते होंगे, इसका अंदाजा शब्दों के चयन और धर्मग्रंथों के उद्धरणों से आप लगा सकते हैं। कमाल खान साहब आपको, आपकी रिपोर्टिंग को और खास तौर से आपकी एक-एक पीटीसी को भूल पाना किसी के लिए आसान नहीं होगा।