किसी देश की राजधानी कैसी होनी चाहिए। अगर केजरीवाल साहब की मानें तो देश की राजधानी की सड़कें लंदन और पेरिस जैसी होनी चाहिए। यही वादा कर या कह लीजिए सपना दिखाकर वो 11 साल पहले सत्ता पर काबिज हुए थे। अब 11 साल बाद माफी मांगते फिर रहे हैं कि मैं दिल्ली की सड़के दुरुस्त नहीं कर पाया। दिल्ली के लोगों को पीने का साफ पानी तक मुहैया नहीं करा पाया। यमुना को साफ नहीं कर पाया। कूड़े के पहाड़ नहीं हटा पाया। फिर भी आप हमें सच कबूल करने के एवज में 5 साल का मौका और दे दीजिए। मैं सबकुछ ठीक कर दूंगा। मगर कैसे? बड़ा सवाल यही है।

केजरीवाल ने 11 साल में किया क्या है? जरा इसपर भी नजर दौड़ा लेते हैं। उनका दावा है कि उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था को ठीक दिया। बिजली और पानी के बिल माफ कर दिए। केजरीवला अपने इन दावों पर काम करते भी नजर आते हैं। लेकिन केजरीवाल जिस तरह से इन योजनाओं को अमलीजामा पहना रहे हैं वो किसी देश की राजधानी को आधुनिक बना सकते हैं? चलिए केजरीवाल के दावों की एक-एक कर पड़ताल करते हैं।
केजरीवाल साहब का दावा है कि उन्होंने दिल्ली में मोहल्ला क्लिनिक का जाल बिछा दिया है। ये मोहल्ला क्लिनिक कहां खुले हैं। ज्यादातर मोहल्ला क्लिनिक फुटपाथों को घेरकर बनाए गए हैं। उनमें से तो कई एमसीडी के कूड़ाघर के सामने हैं। मोहल्ला क्लिनिक में ज्यादातर रिटायर्ड डॉक्टर होते हैं, जिन्हें प्रति मरीज के हिसाब से पैसे मिलते हैं। किसी जांच के लिए लंबी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। दवा कभी मिलती है तो कभी मिलती ही नहीं है। फुटपाथों पर मोहल्ला क्लिनिक का निर्माण दरअसल अवैध अतिक्रमण की श्रेणी में आता है। जिसे केजरीवाल नजरअंदाज करते रहे हैं। जबकि आधुनिक दिल्ली में एम्स, आरएमएल और सफदरजंग जैसे बड़े और अस्पताल बनाए जाने चाहिए थे।
अब बात करते हैं स्कूल की। केजरीवाल साहब ने इक्का-दुक्का ही नए स्कूल बनाए हैं। हां, उन्होंने स्कूलों में नए कमरे और बाथरूम जरूर बनवाए हैं। पुराने स्कूलों की रंगाई-पोताई पर करोड़ों रुपए खर्च किए हैं। और तो और स्कूलों में बनवाए गए बाथरुम की गिनती भी कमरों में कर ली गई है। केजरीवाल कभी ये नहीं बताते कि दिल्ली के दर्जनों स्कूलों में साइंस की पढ़ाई नहीं होती। क्योंकि वहां कोई साइंस के टीचर ही नहीं हैं। नए शिक्षकों की भर्ती का मामला भी लटका हुआ है। जो शिक्षक ठेके पर हैं, उन्हें समान वेतन तक नहीं मिलता है। कुल मिलाकर कहें तो स्कूलों में कुछ नए और आधुनिक सुविधाओं वाले कमरे तो नजर आते हैं लेकिन पढ़ाई की गुणवत्ता को लेकर मामला बेहद कमजोर आता है।
पानी की उपलब्धता किसी भी शहर की बुनियादी जरूरत होती है। लेकिन केजरीवाल सरकार दिल्ली के लोगों को साफ पानी तो छोड़ दीजिए, पानी ही मुहैया नहीं करा पाई है। लिहाजा दिल्ली की मलीन बस्तियों में टैंकर माफिया का राज चलता है। जो मनमानी कीमत पर पानी मुहैया कराते हैं। दिल्ली में पानी की सप्लाई के लिए पाइपलाइन या तो है नहीं, और अगर है भी बरसों पुरानी हैं। सीवर लाइन का तो कई जगह अता-पता ही नहीं है। सड़कें टूटी हैं और नालों का गंदा पानी सड़कों पर बहता रहता है। अगर हम शीला दीक्षित की दिल्ली की तुलना केजरीवाल की दिल्ली से करें तो इसमें विजन का घोर अभाव दिखता है।
शीला दीक्षित ने जब 1998 में दिल्ली की कमान संभाली थी तो दिल्ली में समस्याएं कम नहीं थीं। मगर उनके पास एक अत्याधुनिक दिल्ली को बनाने का सपना था। उन्होंने केंद्र में वाजपेयी सरकार के साथ तू-तू मैं मैं करने की जगह अपने सपने को साकार करने में वक्त लगाया। परिवहन व्यवस्था को दुरुस्त किया। नई बसें खरीदीं। मेट्रो रेल परियोजना के लिए समय पर फंड मुहैया करवाए। पेड़-पौधे लगवाकर हवा और पानी को स्वच्छ बनाने की कोशिश की। मलीन बस्तियों में रहने वाले लोगों को जमीन दिलवाकर बसाने का काम किया। जाम से छुटकारे के लिए फ्लाईओवर का जाल बिछाया। रिंगरोड को सिग्नल फ्री करने की कोशिश की। नए स्टेडियम बनवाए। कला-संस्कृति को बढ़ावा दिया। बच्चों के लिए नए स्कूल-कॉलेज बनवाए। नई अस्पताल और तकनीकी संस्थान खोले। लेकिन केजरीवाल साहब के विकास का मतलब है 200 यूनिट फ्री बिजली और 21 हजार लीटर फ्री पानी।