नई दिल्ली। आज देश में उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति के अपमान को लेकर बवंडर मचा है। ये अपमान हुआ है एक मिमिक्री से। यानी राज्यसभा के सभापति जिस तरह से सदन की कार्यवाही का संचालन करते हैं उसकी नकल तृणमूल के सांसद कल्याण बनर्जी ने सदन के बाहर गेट पर उतारी और राहुल गांधी उस मिमिक्री की तस्वीरें बनाते देखे गए। इससे सभापति महोदय का अपमान हो गया। लेकिन संसद की सुरक्षा में इतनी बड़ी सेंध लगी और देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सदन में आकर बयान नहीं दे रहे, इससे किसी का अपमान नहीं हो रहा है।

अजीब विडंबना है कि आज बीजेपी का कोई नेता संसद की सुरक्षा में लगी सेंध पर बात नहीं करना चाहता। कोई नेता उन सवालों का जवाब नहीं देना चाहता कि बीजेपी के मैसुरु के सांसद प्रताप सिम्हा की अनुशंसा पर ही उन लड़कों के पास बनाए गए थे, जो लोकसभा की दर्शक दीर्घा से सदन में कुदे थे। जिन्होंने संसद के अंदर और बाहर आकर धुएं की शक्ल में रंग फैला दिया था और पूरे देश में अफरा-तफरी मच गई थी। मगर ये सवाल आज नहीं पूछे जा रहे हैं। संसद के चुने हुए विपक्षी सांसदों को एक-एक कर सदन से बाहर का रास्ता दिखाया गया। ऐसे 146 विपक्षी सांसदों को निलंबित कर सदन में कई अहम कानून बिना विपक्ष को चर्चा का मौका दिए पास कराए गए, उससे किसी का कोई अपमान नहीं हुआ।
ये अजीब इत्तेफाक नहीं है कि आज जिस तरह उपराष्ट्रपति एक साधारण सी मिमिक्री को अपनी जाति अपने किसान परिवार से होने का सवाल उठाकर अपमान बता रहे हैं। देश के सामने बहुत आहत नजर आ रहे हैं, उन्होंने संसद की सुरक्षा पर सेंध को लेकर कोई बात नहीं कही। उन्होंने देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को सदन में आकर इस मसले पर जवाब देने के लिए बाध्य नहीं किया। वो बस अपने निजी अपमान का रोना रोते रहे। अब ये बात समझ से परे हैं कि किसी की मिमिक्री से उसकी जाति और उसके व्यवसाय का अपमान कैसे हो गया। स्कूल में बच्चे तो अपने मास्टर साहब की मिमिक्री करते हुए ही बड़े होते हैं। परिवार में लोग एक-दूसरे की मिमिक्री करते हैं तो क्या ये सब किसी को अपमानित करने के लिए होता है?

दरअसल मिमिक्री अपने भीतर के गुस्से के इजहार का एक माध्यम है, ताकि किसी वरिष्ठ और सम्मानित व्यक्ति तक उसकी बात भी चली जा और उसे किसी बेजा भाषा का इस्तेमाल ना करना पड़े। आज आप देख लीजिए, कई टीवी चैनल कार्टून फिल्मों के जरिए देश के नेताओं की किस तरह की तस्वीर पेश कर रहे हैं। और ये कोई फिल्मी चैनल नहीं है। सब के सब न्यूज चैनल हैं। लेकिन तब किसी का कोई अपमान नहीं होता। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी कहा कि हमें तो राज्यसभा के अंदर बोलने नहीं दिया जाता। तो मैं क्या समझूं कि दलित होने के कारण मेरा अपमान किया जा रहा है। या फिर ये देश के दलित समाज का अपमान है।
आज संसद की सुरक्षा में सेंध से ध्यान भटकाने के लिए ही इस तरह की पैंतरेबाजी की जा रही है। जबकि सवाल ये है कि बीजेपी के सांसद प्रताप सिम्हा पर अबतक क्या कार्रवाई की गई है? जिनकी अनुशंसा पर बने पास लेकर 4 लोग संसद परिसर में घुसे और तमाम सुरक्षा एजेंसियों को धत्ता बताते हुए इतनी बड़ी घटना को अंजाम दिया। सवाल तो सरकार से ही पूछे जाएंगे ना, जिनपर देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा की जिम्मेदारी है। लेकिन घोर आश्चर्य का विषय ये है कि आज सवाल भी विपक्ष से ही पूछे जा रहे हैं।
और तो और संवैधानिक पद पर बैठे सभापति के अपमान का मुद्दा बनाकर बीजेपी रोज धरना-प्रदर्शन कर रही है। राहुल गांधी से माफी की मांग कर रही है। सभापति महोदय ने तो सदन के भीतर राहुल गांधी का नाम लिए बगैर उनपर कटाक्ष भी किया। और फोटो खींचने से आहत होने का नजारा पेश किया। ये हास्यास्पद कोशिश ही कही जाएगी। क्योंकि अगर उपराष्ट्रपति महोदय इस मुद्दे पर गंभीर होते, उनका इरादा ध्यान भटकाने का नहीं होता, तो वो सरकार से इस मसले पर जवाब-तलब करते नजर आते। सरकार में बैठे जिम्मेदार लोगों से सदन के अंदर जवाब-तलब करते कि आखिर देश में दूसरी बार ऐसी घटना कैसे हो गई।
आपको याद दिला दें कि 13 दिसंबर 2001 को भी संसद पर हमला हुआ था। जिसमें हमारे कई जवान शहीद हो गए थे। तब भी देश में बीजेपी की सरकार थी। लेकिन तब और आज में इतना फर्क है कि, तब वाजपेयी जी की सरकार इस घटना को लेकर फिक्रमंद नजर आई थी। सदन के अंदर गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने बयान दिया था। विपक्ष के साथ मिल-बैठकर सुरक्षा की समीक्षा की गई थी। नई व्यवस्थाएं बनीं थी। लेकिन आज ऐसा लगता है मानो सरकार विपक्ष को ही दरकिनार करना चाहती है। और वो तमाम काम करती है जिससे देश का ध्यान मूल मुद्दे यानि संसद में हुई बड़ी सुरक्षा चूक और इसकी जिम्मेदारी से भटकाया जा सके।