राजस्थान रंग, रेत, महल और महीन राजनीति की भूमि रही है। यहां की परंपरा रही है कि हर पांच साल में जनता सरकार को पलट देती है। उनको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की सरकार ने अच्छा काम किया या बुरा काम किया। 2013 और 2018 के चुनावों में भी अशोक गहलोत सरकार और वसुंधरा राजे सरकार के खिलाफ राजस्थान के वोटरों के मन में कोई ख़ास गुस्सा दिखाई नहीं देता था। लेकिन उन्होंने बड़े अंतर से सरकार बदल डाली थी। तो क्या इस बार भी ऐसा ही होने जा रहा है? या फिर गहलोत साहब कोई जादू करने जा रहे हैं ताकि दशकों से चली आ रही राजस्थान की परंपरा टूट जाए।
अगले महीने 2023 के होने वाले चुनाव की रिपोर्टिंग के लिए जब हम दिल्ली से राजस्थान की धरती पर कदम रख रहे हैं तो हमारे मन में भी यही सवाल बार-बार उमड़ घुमड़ रहे हैं। क्या इस दफे राजस्थान की जनता का मन बदला है या फिर वो परंपरा को कायम रखने का मन बनाए बैठी है? दरअसल 2013 और 2018 के विधानसभा चुनावों में अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे, दोनों के काम को यहां के वोटरों ने ज्यादा तव्वजो नहीं दी और दोनों को परंपरा के नाम पर शिकस्त झेलनी पड़ी।
राजस्थान के 5.2 करोड़ वोटरों के मन को भांप पाना हमेशा से बहुत मुश्किल रहा है। यहां वसुंधरा राजे सरकार के खिलाफ कोई गुस्सा नहीं हो पाने के बाद भी वो 2018 के चुनाव में 72 सीटें ही जीत पाईं जबकि कांग्रेस के खाते में 100 सीटें आईं थी और गहलोत साहब सत्ता पर काबिज हो गए। तो क्या अबकी वसुंधरा राजे की बारी है? हम इसपर आगे बात करेंगे, लेकिन पहले देख लेते हैं कि इसबार राजस्थान में मुद्दे क्या हैं?
राजश्थान के चुनाव में इस बार भी मुद्दा महिलाओं के खिलाफ अपराध, शिक्षा में सुधार, स्वास्थ्य और सरकारी अ
स्पतालों में सुविधाएं, पेयजल और सफाई की समस्या, बेरोजगारी, मंहगाई, भ्रष्टाचार, बुनियादी सुविधाएं, सड़क, फसलों का सही मूल्य, बेहतर प्रशासन, कानून व्यवस्था ही हैं। एक सर्वे के मुताबिक 2018 के चुनाव में भी तकरीबन यही मुद्दे हावी थे। तब 29.2 फीसदी लोग बेरोजगारी, 21.6 फीसदी लोग कर्जमाफी, 18.8 फीसदी लोग महंगाई, 9.6 फीसदी लोग कानून-व्यवस्था, 8.8 फसीदी लोग स्वास्थ्य सुविधाओं, 7.4 फीसदी लोग अच्छी शिक्षा और 4.6 फीसदी लोग सामाजिक सुरक्षा को बड़ा मुद्दा मानते थे।
बीते चुनाव में इन मुद्दों पर वसुंधरा सरकार के कामकाज को लेकर राजस्थान के लोगों के मन में कोई नकारात्मक धारणा नहीं थी। लेकिन परंपरा आड़े आ गई और गहलोत साहब को सरकार बनाने का मौका मिल गया। ठीक ऐसा ही 2013 के चुनावों में भी हुआ। स्वास्थ्य सुविधाओं और किसानों के ऋण माफी को लेकर क्रांतिकारी काम करने के बावजूद गहलोत साहब भारी अंतरों से चुनाव हार गए। तो क्या राजस्थान फिर से अपनी परंपरा को दोहराने जा रहा है? या इस दफे गहलोत साहब परंपरा तोड़ने के लिए क
मर कसकर तैयार बैठे हैं!
हम इन्ही सवालों का जवाब तलाशने दिल्ली से भरतपुर पहुंचे तो हमारी धारणा टूटती सी नजर आई। लोगबाग इस बार राजस्थान की सियासी परंपरा को तोड़ने को आतुर नजर आ रहे थे। वो खुलकर कह रहे थे कि इस बार गहलोत साहब टक्कर में हैं और उनकी सरकार दोबारा बन सकती है। इसकी एक बड़ी वजह तो ये हैं जिन मुद्दों की चर्चा हमने उपर की उन मोर्चों पर गहलोत साहब ने अच्छा काम किया है। लेकिन इससे भी बड़ा फैक्टर ये नजर आया कि यहां को वोटर बीजेपी की ओर से वसुंधरा राजे को दरकिनार किए जाने से नाराज़ हैं। वो बाहर से थोपे गए किसी नेता को दिल में उतारने को तैयार नजर नहीं आ रहे।
राजस्थान में सियासी समीकरण
अगर हम राजस्थान के सियासी समीकरण की बात करें तो यहां कांग्रेस में जितनी फूट है उससे कहीं ज्यादा फूट बीजेपी में है। बीजेपी का आरोप है कि गहलोत सरकार ने किसान कर्ज माफी.का अपना सियासी वादा पूरा नहीं किया। वहीं राज्य सरकार का दावा है कि उसने सहकारी बैंकों से लिए गए ऋण माफ कर दिए हैं, और अब यह केंद्र की जिम्मेदारी है कि वह वाणिज्यिक बैंकों से किसानों का बकाया माफ कराए।
ओल्ड पेंशन स्कीम, चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना, गरीब परिवारों के लिए सस्ता एलपीजी सिलेंडर और सामाजिक सुरक्षा भत्ता से कांग्रेस जनता का वोट खींचना चाह तो रही है मगर कानून और व्यवस्था के मुद्दे पर वो बैकफुट पर नजर आती है। सिंचाई और पीने के पानी की जरूरतों के लिए कांग्रेस पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना को ‘राष्ट्रीय परियोजना’ का दर्जा देने की मांग करती रही है। लेकिन बीजेपी ने इसे अनसुना कर दिया है। इसका खामियाजा बीजेपी को राजस्थान के 13 जिलों में भुगतना पड़ सकता है।
राजस्थान में भाजपा के लिए हिंदुत्व कार्ड और राम मंदिर बड़ा मुद्दा है, लेकिन जमीन पर इन मुद्दों पर वोट मिलते दिखाई नहीं देते। यहां समाज का तानाबाना हिंदू-मुस्लिम एकता और भाईचारे पर टिका है। अगर यहां के दूध का कारोबार मुसलमानों के हाथ में है तो उसके खरीदार ज्यादातर हिंदू भाई-बहन ही हैं। हालांकि बीजेपी गहलोत सरकार पर मुसलमानों के तुष्टिकरण का आरोप लगाती है।
राजस्थान में इसबार पेपर लीक के 14 मामले हैं जिसे लोकर यहां के युवा खासे नाराज नजर आते हैं। जिससे करीब एक करोड़ से ज्यादा युवा सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं। ये एक बड़ी संख्या है जो गहलोत सरकार के लिए एक बड़ा सिरदर्द साबित हो सकती है। क्योंकि इस बार राजस्थान में 48.92 लाख युवा मतदाता पहली बार वोट डालने जा रहे हैं। जिनकी भूमिका निर्णायक हो सकती है।
अगर हम प्रदेश में राजनीतिक सिर फुटौव्वल की बात करें तो कांग्रेस और बीजेपी दोनों किसी से कम नहीं है। कांग्रेस में सचिन पायलट का धड़ा मुश्किलें खड़ा करता रहता है तो बीजेपी में वसुंधरा को मोटे तौर पर दरकिनार ही कर दिया गया है। बीजेपी के कार्यकर्ता इससे खासे नाराज और निराश भी नजर आते हैं। उनका ऐसा मानना है कि मोदीजी की वसुंधरा से नहीं बनती है, क्योंकि वो अकेली नेता है जो मोदी की आंखों में आंखें डाल कर बात करती है। वो उनकी चमचागिरी नहीं करती। हालांकि यहां नवगठित भारतीय आदिवासी पार्टी, आदिवासी क्षेत्रों में कांग्रेस के लिए चुनौतियां पेश करती नज़र आ रही है।
राजस्थान में 200 सीट है जिनमें कांग्रेस के पास 108 और बीजेपी के पास 70 सीटें है। बाकी निर्दलीय और छोटे दलों के खाते में गईं हैं। अगर 2018 के नतीजों की बात करें तो बीजेपी को 38.77 फीसदी वोट मिले थे जबकि कांग्रेस को 39.3 फीसदी वोट मिले थे। वहीं अन्य दलों को 20.9 फीसदी वोट मिले थे। जिनमें निर्दलीय और दूसरे दलों के प्रत्याशी शामिल थे।
यानी 2018 के चुनावों में कांग्रेस और बीजेपी के बीच वोटों का अंतर 1 फीसदी से भी कम रहा था। रोचक ये है कि यहां 1993 के बाद कोई भी पार्टी अपनी जीत को दोहरा नहीं पाई है। ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या अशोक गहलोत इस बार कोई जादू कर पाएंगे या फिर राजस्थान की जनता हर पांच साल बाद सरकार को बदलने की अपनी तीन दशकों की पुरानी परंपरा को कायम रखेगी। मुकाबला दिलचस्प और रोचक होने जा रहा है। ऐसे में परिणाम को लेकर कोई भविष्याणी करना बड़ी भूल साबित होगी। क्योंकि वसुंधरा को टिकट मिलने के बाद मुकाबला फिर से टक्कर का हो गया है।